the white tiger repute Adarsh Gourav percentage his long run plan | मन में अपराध बोध तो है कि साकेत का वह रेहड़ी वाला अब मुझे देखेगा तो धोखेबाज न समझे: आदर्श गौरव

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एक घंटा पहलेलेखक: अमित कर्ण

हालिया रिलीज ‘द व्हाइट टाइगर’ ने आदर्श गौरव को बेशुमार ग्‍लोबल पॉपुलैरिटी से नवाजा है। वे पहले इंडियन एक्‍टर भी बने जो रिज अहमद जैसी बड़ी हस्‍ती के साथ अमेरिका में इंडियन स्पिरिट अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट हुए। एशियन वर्ल्‍ड फिल्‍म फेस्टिवल में तो वो राइजिंग अवॉर्ड से सम्‍मानित भी हुए। अपनी खुशी और भविष्‍य की योजनाएं उन्‍होंने दैनिक भास्‍कर से शेयर कीं।

  • अपने नाम का गौरव बढ़ाया है। नाम और पॉपुलैरिटी का क्रेडिट किन्‍हें देना चाहेंगे?

आदर्श- नाम का भइया और पापा को। काम के लिए भी उन दोनों को ही। मेरे मामले में भी परिवार का सपोर्ट रहा। कम उम्र से ही मुझे काफी आजादी मिली। उसके चलते जिम्‍मेदारी का भाव भी तभी आ गया था। 14 साल की उम्र से ही ऑडिशन देने लगा था। 19वें साल के बाद अपने हुनर को मांजने लगा।

  • कोई गॉडफादर भी नहीं था?

आदर्श- जी हां। इंडस्‍ट्री में दूर-दूर तक कोई जानने वाला नहीं था। इनफैक्‍ट साल 2007 में जमशेदपुर से मुंबई आए थे तो शहर में कोई जान-पहचान तक का नहीं था। तब से लेकर अब तक की जर्नी बड़ी कमाल की रही है।

  • आप के पिता बैंक में थे। फैमिली से कोई फिल्‍मों में नहीं था। फिर ये थॉट जेहन में कैसे आया था?

आदर्श- बॉम्‍बे आने के बाद ही सोचा। वह इसलिए कि साल 2008 में काला घोड़ा फेस्टिवल में परफॉर्म कर रहा था तो किसी ने देखकर कहा कि एक्टिंग करना चाहोगे। तब मेरी उम्र महज 13 या 14 साल की थी। मैंने भी हल्‍के में हां बोल दिया। उससे पहले की उम्र में तो मैं मैं बड़ा ही शरारती था। बहुत प्रैंक्‍स किया करता था। मुझे बदमाशी करने में मजा आता था। बहरहाल, काला घोड़ा फेस्टिवल के बाद ऑडिशन देने लगा। वह सिलसिला छह साल चला। फिर जब 19 साल का हुआ तो क्राफ्ट को लेकर गंभीर हुआ। तब तक वह मेरे लिए हॉबी जैसा था।

  • उन छह सालों में कितने रिजेक्‍शंस मिले?

आदर्श- बहुत मिले। एक एक्‍टर की लाइफ में रिजेक्‍शंस तो बड़ी नॉर्मल सी चीज है। आप भले बहुत अच्‍छे एक्‍टर हों, मगर मुमकिन है कि डायरेक्‍टर का विजन कुछ और हो। उस खाके में फिट न बैठे तो आप का ऑडिशन रिजेक्‍ट हो सकता है। ये तो बस एक चीज है। ऐसी 50 और चीजें होती हैं, जिनके चलते आप को कोई रोल मिलता है।

  • बलराम हलवाई के रोल के लिए कितने एक्‍टर्स ने ऑडिशन दिए थे?

आदर्श- वो अगर सोचता तो पागल ही हो जाता। हम तो बस रोल के लिए तैयारी क्‍या करनी है, उसी पर फोकस करते हैं। यह जरूर है कि पांच या छह राउंड ऑडिशन दिए थे।

  • कभी डायरेक्‍टर से भी नहीं पूछा बाद में कि क्‍यों चुना?

आदर्श- अतिरिक्‍त जिज्ञासा दिखाकर मैं क्‍यों अपने ही पांव पर कुल्‍हाड़ी मारता। सिलेक्‍शन हो चुका था तो मैंने फिर अपने काम पर ही फोकस किया। ज्‍यादा कुछ नहीं सोचा या पूछा।

  • शूट के ब्रेक में प्रियंका चोपड़ा और राजकुमार राव से क्‍या बातें होती थीं?

आदर्श- हम 90 के दशक के म्‍यूजिक के बारे में बातें करते थे। जब हम विलेज वाला सीन शूट कर रहे थे, वहां हम उनसे अर्ली और लेट 90 के म्‍यूजिक, एल्‍बम, कैसेट प्‍लेयर के बारे में बातें करते थे। प्रियंका अच्‍छा गाती भी हैं तो उन्‍हें गीत-संगीत में बड़ी दिलचस्‍पी थी। यहां तक कि फिल्‍म पॉपुलर होने के बाद भी हमने बस एक-दूसरे को बधाई दी। हम तीनों और डायरेक्‍टर का एक वॉट्सऐप ग्रुप है। हम एक दूसरे को अपडेटेड रखते हैं वहां।

  • बलराम हलवाई के कैरेक्‍टर स्किन में जाने के लिए आपने रेहड़ी वाले के यहां काम भी किया था? कोई गिल्‍ट है मन में?

आदर्श- जी हां। उस वक्‍त उसे बताया नहीं था कि मैं ऐसा क्‍यों कर रहा हूं। अब जब वह कहीं मुझे देखेगा तो डर है कि कहीं यह न सोचे कि मैं धोखेबाज था। कई बार मुझे ऐसा लगता भी था कि मैं ऐसा कर क्‍यों रहा हूं। क्‍या जरूरत है ऐसा करने की। पहले दिन तो लग रहा था कि अरे वाह मैं प्‍लेट धो रहा हूं। अरे वाह झाडू लगा रहा हूं। पर कभी-कभी लगता था कि मैं तो 10 से 15 दिन यह करके निकल जाऊंगा। पर यह बहुत सारे लोगों की रियलिटी है। लोगों का पूरा जीवन यही करने में निकल जाता है। यह भाव मन में आने पर बड़ा गिल्‍ट देता था। वह इसलिए कि लोगों का ट्रस्‍ट तोड़ रहे हैं। साकेत ही नहीं, जब मैं गांव में भी था तो उनसे अपनी पहचान छिपाकर ही एक्‍ट कर रहा था।

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