Deepak Bhardwaj was once in reserve drive however he himself got here in strike drive | दीपक भारद्वाज रिजर्व फोर्स में थे, वे खुद स्ट्राइक फोर्स में आए; गोली लगने के बाद भी लड़ते रहे तो नक्सलियों ने उन पर ग्रेनेड फेंक दिया

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रायपुर12 घंटे पहले

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जांजगीर के शहीद दीपक भारद्वाज की शादी 2019 में हुई थी। - Dainik Bhaskar

जांजगीर के शहीद दीपक भारद्वाज की शादी 2019 में हुई थी।

बीजापुर-सुकमा जिले के बॉर्डर पर three अप्रैल को नक्सली मुठभेड़ में 22 जवान शहीद हुए और कई जवान घायल हो गए। घायल जवानों के होश में आने के बाद बहादुरी और त्याग की अलग-अलग कहानियां सामने आ रही हैं। रायपुर में भर्ती जवान और उनके साथी मैदान ए जंग के किस्से बता रहे हैं। जांजगीर के शहीद दीपक भारद्वाज की बहादुरी की कहनी कमांडर संजय पाल ने बताई। दैनिक भास्कर के लिए SDOP अभिषेक सिंह ने कमांडर संजय पाल से बात की।

संजय पाल बस्तर के सबसे अनुभवी कमांडर्स में से एक हैं। उन्होंने कई बार नक्सलियों से लोहा लिया है और कई बार धूल भी चटाई है। उनके मुकाबले दीपक अभी बिलकुल ही नया था, DRG में आए उसे 2 महीने ही तो हुए थे। उसके पहले थाना कुटरू में प्रभारी था। उसका पहला ही बड़ा ऑपरेशन था। उसे रिजर्व फोर्स में रखा गया था, लेकिन दीपक ने बोलकर स्ट्राइक फ़ोर्स में अपना नाम लिखवाया। उसने अपने एक साथी से रास्ते में जाते हुए कहा “नक्सलियों को हमसे डरना चाहिए, हम पुलिसवाले हैं, संविधान के रक्षक… वो बंदूक के बल पर खूनी क्रांति लाना चाहते हैं और हम शांति।

अचानक से जब ताबड़तोड़ बम आसमानों से गिरने लगे तो सबने अपनी-अपनी पोजीशन ली। इतने बम गिर रहे थे कि जैसे बारिश हो रही हो। संजय पाल को तुरंत दीपक का खयाल आया। उसने पलटकर देखा तो दीपक एक छिंद पेड़ की आड़ लेकर फायर किए जा रहा था और संजय पाल के देखते-देखते ही उसने दो नक्सलियों को गोली मारी।

लाल घेरे में दीपक भारद्वाज। सर्चिंग के दौरान कहीं भी फायरिंग और ब्लास्ट का खतरा रहता था, लेकिन दीपक साथियों के साथ मुस्कुराते दिखते थे।

लाल घेरे में दीपक भारद्वाज। सर्चिंग के दौरान कहीं भी फायरिंग और ब्लास्ट का खतरा रहता था, लेकिन दीपक साथियों के साथ मुस्कुराते दिखते थे।

हाथ, पेट में गोली लगने के बाद भी दीपक लड़ रहे थे

संजय पाल उसे देखकर दंग रह गए। थोड़ी देर बाद संजय पाल अपनी टीम को कवरिंग फायर देकर निकाल रहे थे तो उन्होंने दीपक को भी आवाज दी, मगर धमाकों के बीच उन तक आवाज जा नहीं रही थी। दीपक ने फिर भी उनकी ओर देखा और इशारे में कहा कि आप चलो मैं अपनी टीम लेकर आता हूं। संजय पाल अपनी टीम को निकालने लगे। उसके बाद उन्होंने दीपक को नहीं देखा।

इधर, दीपक के हाथ में एक गोली लगी तो मनीष नाम के सिपाही ने उन्हें कहा – “साहब आप इधर आ जाओ, आप घायल हो..हम लोग आपको निकाल लेंगे। दीपक ने कहा कि तुम लोग घायल होकर गोली चला सकते हो तो मैं क्यों नहीं चला सकता। कवरिंग फायर देते हुए पीछे बढ़ो…मैं भी साथ में चल रहा हूं, तुम लोगों को कुछ नहीं होगा मेरे रहते। तभी दूसरी गोली दीपक के पेट में आकर लगी।

दीपक गिरा, लेकिन फिर से उठा और फायर किया और एक और नक्सली को गोली मारी। उसकी टीम के लोग भी नक्सलियों को जवाब देते रहे। इतना होने के बाद भी जब दीपक नक्सलियों के आगे नहीं झुका, तो नक्सलियों ने इस बार ग्रेनेड दीपक के पैरों के पास फेंका और वो शहीद हो गया।

दिसंबर 2019 में हुई थी शहीद दीपक की शादी

मनीष ने ग्रेनेड लांचर वाले पर चिल्लाते हुए ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं और मार गिराया मगर दीपक के पार्थिव शरीर को उठाने गया तो फिर से ताबड़तोड़ गोलियां चलने लगीं और वो लोग किसी तरह वापस हुए। इन सब से अनजान संजय पाल इधर थोड़ी दूर पर हेलीकॉप्टर बुलाकर शहीदों और घायलों को उसमें लोड करवा रहे थे। जवान लौटकर कैम्प की तरफ आये। संजय पाल अभी पहुंचे ही थे और खड़े थे DSP आशीष कुंजाम के साथ। तभी मनीष आया एक घायल जवान को लिए हुए और संजय पाल को देखते ही रोने लगा और कहा कि भारद्वाज साहब की बॉडी नहीं ला पाए साहब। जांजगीर के दीपक की शादी दिसंबर 2019 में हुई थी। तिरंगे में लिपटा उसका पार्थिव शरीर इतना क्षत-विक्षत था कि देखना मुश्किल था। उसके पिता शिक्षक हैं और दीपक खुद एक मेधावी छात्र था और नवोदय से पढ़ा था।

ग्रेनेड फटने से SI घायल हो गए, बलराज सिंह ने पगड़ी फाड़कर पट्‌टी लगा दी
ऐसी ही एक कहानी है पंजाब के तरनतारन गांव के रहने वाले बलराज सिंह की। उनकी तीन बहनें हैं। बलराज के मुताबिक, उनके गांव में हर आदमी आर्मी में जाना चाहता है। बलराज सिंह कोबरा बटालियन के जवान हैं। उन्होंने जब देखा कि उनके SI को ग्रेनेड फटने के बाद पांव में छर्रे घुस गए हैं, तो उनके पास उस वक्त फ़र्स्ट एड नहीं था। बलराज सिंह सरदार हैं और पगड़ी पहनते हैं। लिहाजा, उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी, उसके कपड़े फाड़े और SI की पट्टी की। इसे देखते हुए छत्तीसगढ़ के स्पेशल DG आरके विज उनसे मिलने हास्पिटल पहुंचे और उन्हें पगड़ी भेंट की। बलराज सिंह की कहानी… उन्हीं की ज़ुबानी:-

पगड़ी के सिवा कुछ था नहीं SI साहब की पट्टी करने, क्या करता

बासागुड़ा से 2 अप्रैल की रात nine बजे हम गाड़ियों से निकले और तर्रेम पहुंचे। टेकलगुड़ा और जोनागुड़ा तक फोर्स को जाना था। वहां नक्सलियों के होने की सूचना थी। वहां से सर्चिंग करते हुए वापस आना था। 2000 जवानों की टीम अलग-अलग दिशा से निकली थी। जंगल में सर्चिंग करते हुए 12 किलोमीटर की दूरी तय कर three अप्रैल की सुबह लगभग eight बजे जोनागुड़ा की पहाड़ियों के पास पहुंचे थे। वहां से टेकलगुड़ा और जोनागुड़ा गांव नजदीक था। नक्सली यहीं थे। उन इलाकों को सर्च किया गया, लेकिन तब वहां कोई नहीं था।

अस्पताल में भर्ती जवान को पगड़ी भेंट करते विशेष पुलिस महानिदेशक आरके विज।

अस्पताल में भर्ती जवान को पगड़ी भेंट करते विशेष पुलिस महानिदेशक आरके विज।

फोर्स थक गई और ऑपरेशन लगभग खत्म हो गया। जोनागुड़ा टीले में फोर्स रुक गई। लगभग 400 जवान थे। दो घंटे रुकने के बाद हमें वापस लौटना था। इसी दौरान अचानक फायरिंग शुरू हुई। पहाड़ियों से गालियां चलने लगी। पेड़ और टीले की आड़ लेकर जवानों ने भी जवाबी फायरिंग शुरू की। ग्रेनेड, रॉकेट लांचर से भी हमला हो रहा था। मेरे सामने SI साहब चल रहे थे। अचानक उनके सामने ग्रेनेड फटा और छर्रा उनके पैरों में लगा। पैरों से खून बहने लगा। वे पेड़ की आड़ लेकर बैठ गए। दर्द से चिल्ला रहे थे, लेकिन मरहम-पट्टी करने वाले भी घायल हो चुके थे। कुछ वहीं शहीद हो गए थे।

SI साहब का दर्द से बुरा हाल था। तब मैंने अपनी पगड़ी खोली और फाड़कर SI के पैरों में कसकर बांध दिया और फिर मोर्चा संभाल लिया। फायरिंग करते-करते हम नजदीक के गांव की ओर गए। नक्सली हमारा पीछा कर रहे थे। ये पूरी तरह उनका इलाका था, जिसके चप्पे चप्पे से वो वाकिफ थे और हम अनजान। नक्सली वहां आ गए और फायरिंग की। सामने से एक गोली आई और मेरे पेट को चीरकर निकल गई। खून बहने लगा। मैं वहीं बैठ गया। जवानों ने उठाने की कोशिश की तो उन्हें मना किया और कहा कि अभी मोर्चा संभालें। जवान सामने फायर करते हुए आगे बढ़ते रहे। तीन किलोमीटर चलने के बाद हम सीलगेर पहुंचे। यहां से हमें हेलीकॉप्टर से एयर लिफ्ट किया गया।

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