A part of the issue, reminiscent of Hidma, focal point on them approach getting stuck in Mental Conflict; Our want is strategic exchange | ​​​​​​​हिडमा जैसों पर फोकस करने का मतलब है साइकोलॉजिकल वारफेयर में फंसना; जबकि हमारी जरूरत है स्ट्रैटजिकल चेंज

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नई दिल्ली41 मिनट पहले

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बीजापुर नक्सली मुठभेड़ को five दिन बीत गए हैं। इस ऑपरेशन में जितना जिक्र शहीद जवानों का हो रहा है, उतना ही जिक्र नक्सली कमांडर हिडमा का हो रहा है। जो इस हमले का मास्टरमाइंड था। हिडमा नक्सल समस्या का बस एक हिस्सा भर है। वह खत्म हो गया तो भी पूरी समस्या खत्म नहीं होगी। सुनने में आ रहा है कि पूरा ऑपरेशन ही हिडमा के खात्मे के लिए प्लान किया गया था। सच तो ये है कि आगे भी ऐसे ऑपरेशन प्लान करने का मतलब होगा- नक्सलियों की साइकोलॉजिकल वारफेयर में फंसना। जबकि हमारी जरूरत अब स्ट्रैटजिकल चेंज है। ऐसा क्यों, उसकी Four वजहें…

1. अपने कमांडरों को हीरो बनाना नक्सलियों की स्ट्रैटजी
नक्सली जिस गुरिल्ला वार का इस्तेमाल सुरक्षा बलों के खिलाफ करते हैं, उसमें कोई खास व्यक्ति नहीं, बल्कि इलाके के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हालात ज्यादा मायने रखते हैं। नक्सली अपने कमांडरों को नायकों जैसा दर्जा देते हैं। खबरें भी ऐसी ही प्रचारित की जाती हैं, जिससे ये कमांडर नायक लगें। ये उनकी मनोवैज्ञानिक युद्ध रणनीति है। ऐसे में हिडमा जैसों को केंद्र में रखकर ऑपरेशन प्लान करना नक्सलियों के वारफेयर में फंसना होगा। यहां सरकार और सुरक्षा बलों को रणनीति में बदलाव लाने की जरूरत है।

2. पहले भी हिडमा जैसे कई आए, पर उनके खात्मे से कुछ नहीं बदला
बस्तरिया आदिवासी होने की वजह से हिडमा जैसे व्यक्ति की उपयोगिता नक्सलियों के लिए काफी बढ़ जाती है। लेकिन यही अपने आप में आंदोलन का सबसे अहम कारक नहीं होता। इतिहास देखें तो रमन्ना और विजय जैसे कमांडर भी आए। रमन्ना दो दशक से ज्यादा समय तक दंडकारण्य का सुप्रीम नक्सल कमांडर रहा था। विजय हिडमा के ही गांव का रहने वाला था, जिसका सलवा जुडूम के दौरान लोकल आदिवासियों की नक्सल संगठनों में भर्ती करने में अहम रोल था। इसके चलते नक्सलियों ने 20 से ज्यादा कंपनियां और दो बटालियन तक बना लीं। विजय स्पेशल दंडकारण्य जोनल समिति का सदस्य भी बना। 2010 में ट्रैक्टर दुर्घटना में जब उसकी मृत्यु हुई, तब हिडमा उसका अंगरक्षक था। रमन्ना और विजय का खात्मा हुआ, पर नक्सल आंदोलन पर इसका खास असर नहीं पड़ा।

3. शहादत का बदला लेने की बात, पर इससे सीख नहीं ली जा रही
अब सरकार और सुरक्षा बल शहादत का बदला लेने की बात कह रहे हैं। नक्सल समस्या के पूरी तरह से खात्मे की बात हो रही है। मीडिया और सरकारी तंत्र में हिडमा के नाम की गूंज से तो यही लगता है कि इन हमलों से कोई सीख नहीं ली जा रही। ऐसे हमलों का रिव्यू नहीं हो रहा है। मुठभेड़ों और एंबुश से निपटने के लिए स्ट्रैटजी में क्या बदलाव किया जाए, इस पर कोई नहीं सोच रहा। हर बार कुछ जूनियर अधिकारियों पर एक्शन का दिखावा किया जाता है। ग्राउंड ट्रूप्स के हौसलों को कमजोर कर वार जोन में धकेल दिया जाता है।

4. अधिकारियों की ऑपरेशनल समझ कम, नतीजे जवान भुगतते हैं
बीजापुर में हिडमा को खोजने के लिए सुरक्षा बलों के 2 हजार से ज्यादा जवान जंगल में भेज दिए गए। किस इनपुट के आधार पर और किसने इस ऑपरेशन की योजना बनाई? इस इनपुट का रिव्यू किसने किया और इतने बड़े ऑपरेशन को शुरू करने का ऑर्डर दिया। इसकी अभी जांच नहीं हुई। ये सब नहीं हुआ तो कुछ दिनों में एक और हमला होगा। दरअसल, जरूरत है हिडमा जैसे सिंबल्स को अहमियत न देते हुए टॉप लेवल पर बैठे अफसरों की क्षमताओं का रिव्यू करना। जिनका कद तो ऊंचा है, पर ऑपरेशनल समझ कम। इसका खामियाजा बार-बार जवानों को उठाना पड़ता है।

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